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सुप्रीम कोर्ट : ट्रक हादसे में नुकसान पर 3.25 लाख रुपये मुआवजा देगी बीमा कंपनी

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से जुड़े एक नये मामले में कहा है की सार्वजनिक सेवा का काम कर रहे अधिकारियों को कोर्ट में समन करना गैर जरूरी है। इसके साथ ही अदालत ने हाईकोर्ट के आदेशो को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग के फैसले को रद्द करते हुए बीमा कंपनी को हादसे में ट्रक को हुए नुकसान पर ग्राहक को 3.25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश का पालन करने को बोला गया है। आयोग ने ट्रक मालिक की मुआवजे की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि  ज्यादा संख्या में यात्रियों के कारण हादसा नहीं हुआ।

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यन की सलाहकार ने आयोग के तर्क को पुरी तरह से गलत बताया गया हैं और बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस को ट्रक के मालिक को 3.25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। पीठ ने अपने 30 सितंबर के आदेश में कहा, लापरवाही से वाहन चलाने के कारण यात्री को देय मुआवजे के लिए तीसरे पक्ष के दावे के बीच स्पष्ट अंतर है, जबकि वर्तमान मामला खुद को हुए नुकसान का है। यह ट्रक में सवार यात्रियों की संख्या पर किसी तरह निर्भर नहीं है। ऐसे में आयोग का फैसला कानून संगत नहीं है और इसे रद्द किया है।

सुप्रीम कोर्ट: अपना काम कर रहे अधिकारियों को कोर्ट बुलाने की कोई जरूरत नहीं हैं : 

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए बताया है कि सार्वजनिक सेवा का काम कर रहे अधिकारियों को कोर्ट में प्रस्तुत  करना जरूरी नहीं है। मामला प्रथम यूपी ग्रामीण बैंक के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी से जुड़ा है। इस कर्मचारी की याचिका पर बैंक के चेयरमैन और क्षेत्रीय प्रबंधक को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समन भेज कर तलब किया था। 

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामासुब्रह्मण्यन की सलाहकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर नाखुशी जताते हुए कहा कि हमें इन दोनों अधिकारियों को प्रस्तुत करने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। यदि हाईकोर्ट को लगता है कि संबंधित कर्मचारी की बर्खास्तगी सही नहीं है तो कोर्ट इस बारे में आदेश पारित करने में सक्षम है। इसके लिए सार्वजनिक सेवा में रत अधिकारियों को तलब करना गैर जरूरी है। 8 अक्तूबर के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया गया हैं।



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