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Climate Change Update 2022: मुख्य लड़ाई तापक्रम कम करना

 Climate Change Update 2022: मुख्य लड़ाई तापक्रम कम करना 

जलवायु परिवर्तन से मुख्य लड़ाई तापक्रम कम करना और जल संसाधनों को मात्रा व गुणवत्ता में बचाए रखना है। देश और विश्व के परिप्रेक्ष्य में उत्तराखंड के जलते जंगल इस लड़ाई को कमजोर करते हैं। वर्ष 2000 में उत्तराखंड के राज्य बनने के बाद लगभग 50 हजार हेक्टयर वन भूमि वनाग्नियों की भेंट चढ़ चुकी है।




वैसे इन दिनों राजस्थान के अलवर जिले के सरिस्का के जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए सेना के हेलीकॉप्टर तक बुलाने पड़े हैं। छत्तीसगढ़ के भी कई इलाके इन दिनों जंगलों में लगी आग से जूझ रहे हैं। जाहिर है, जंगलों में लगी आग एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

वनाग्नि के कारकों को नियंत्रित करने के लिए वांछित है कि जैसे, किसी प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी पर उसके क्षेत्र में होने वाले सांप्रदायिक दंगों की जिम्मेदारी तय होती है, वैसे ही वनाधिकारियों को भी अपने-अपने वन क्षेत्रों में वन तस्करी, अग्निकांडों आदि के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। वांछित यह भी है कि वन विभाग वन क्षेत्रों में नमी बनाए रखने, वहां के तालाब जैसे जलस्रोतों के रख-रखाव के लिए भी जिम्मेदार हो।


उत्तराखंड का 71 प्रतिशत क्षेत्र (38,000 वर्ग किलोमीटर) वन क्षेत्र है। इनमें वन्य जीव अभयारण्य, संरक्षित दुर्लभ वानस्पतिक उद्यान, घोषित पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र और ग्लेशियर्स हिम पोषित गंगा, यमुना व उनकी सहायक नदियों के उद्गम क्षेत्र भी हैं, जो वनाग्नियों से आपदाग्रस्त हो जाते हैं। 

भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2020 में कहा कि खेती के अपशिष्टों को जलाने और जंगलों की आग से गंगोत्री ग्लेशियर को खतरा पैदा हो रहा है। उत्तराखंड में जंगलों में लगने वाली आग का मौसम और तीर्थयात्रियों तथा पर्यटकों का मौसम आपस में गूंथ जाते हैं। राजमार्गों व शाखा मार्गों तक पहुंची वनाग्नि पर्यटन, तीर्थाटन व स्थानीय जन की आजीविकाओं को प्रभावित करती है।

नब्बे साल पुरानी अन्य कहीं न पाई जाने वाली उत्तराखंड की सामुदायिक वन पंचायत प्रणाली के सरकारीकरण से भी वनाग्नियों से सामुदायिक लड़ाई कमजोर पड़ी है। अंग्रेजी हुकूमत ने खासकर कुमांऊ- गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में वनों पर सरकारी स्वामित्व स्थापित करने के जब प्रयास आरंभ किए थे, तब ग्रामीणों ने जगह-जगह इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। इन आंदोलनों के कारण ही 1930 में वन पंचायत प्रणाली लागू की गई थी।

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