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Anek Movie Review: ऑस्कर में जाने का दम भरती ‘अनेक’

Anek Movie Review: ऑस्कर में जाने का दम भरती ‘अनेक’

फिल्म ‘अनेक’ देखते हुए मुझे अपनी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की डेढ़ दशक पहले की वह यात्रा बार बार याद आती रही जिसमें गलती से मैं अपने पूरे परिवार को साथ लेकर चला गया था। दंतेवाड़ा, बस्तर के अंदरूनी इलाकों में घूमते हुए जान हथेली पर थी लेकिन भरोसा इस बात का था कि इलाके के लोग जुबान के पक्के होते हैं। 




गाड़ी का नंबर उनकी सारी टीमों को इलाके के एक रिपोर्टर की मार्फत भिजवाया गया था और भरोसा मिला था कि हम सुरक्षित हैं। लेकिन डर ये भी बना रहा कि कहीं अगर किसी विरोधी गुट ने सुर्खियां बनाने की ठान ली तो? तीन दिन तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के भीतर तक घूमने के बाद ये समझ आया कि कोई तो है जो चाहता है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अशांति ही बनी रहे। 

फिल्म ‘अनेक’ इसी सवाल को उत्तर पूर्व में लेकर जाती है। सिर्फ 24 किमी चौड़े गलियारे से बाकी देश से जुड़े उत्तर पूर्व के राज्यों के किसानों की पूरी फसल हाईवे पर खड़े ट्रकों में सड़ जाती है क्योंकि उन्हें दूसरी तरफ से आती फौज की गाड़ियों के लिए जगह बनानी होती है।

कहानी उत्तर पूर्व के संघर्ष की


फिल्म ‘अनेक’ देश के सबसे मशहूर नारे ‘जय जवान जय किसान’ को दो हिस्सों में बांटकर एक दूसरे के आमने सामने ले आती है। सरकार उत्तर पूर्व में शांति चाहती है। शांति वार्ता हो चुकी है। शांति समझौते पर हस्ताक्षर अब नाक का सवाल है। 




टेबल पर बैठे उग्रवादियों के नेता की नाक में दम करने के लिए एक अंडरकवर एजेंट जिस गुट को पालता रहा है, वही अब शांति समझौते के खिलाफ है। सरकार शांति चाहती है। और, फिल्म एक जगह कहती है,  ‘हिंसा को बनाए रखना शांति बनाए रखने से ज्यादा आसान है।’ सच भी है युद्ध एक कारोबार है जिसमें मुनाफे की गारंटी शर्तिया होती है। शांति में क्या रखा है, सब कुछ सही चलता रहे तो न सरकारों के पास काम होगा और न ही हथियार बेचने वालों के पास कारोबार।

ऑस्कर में जाने का दम


आयुष्मान खुराना की फिल्में सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं को तोड़ती रही हैं। इस बार उनकी नई फिल्म ‘अनेक’ राजनीतिक वर्जनाओं को तोड़ रही है। अनुभव सिन्हा ने फिल्म ‘मुल्क’ के बाद जो अपना विचार परिवर्तन किया है, उसने उन्हें एक बेहतर फिल्ममेकर बनाने में बहुत मदद की। 

फिल्म ‘अनेक’ इस बदले हुए अनुभव सिन्हा का अब तक का बेहतरीन काम है। उत्तर पूर्व पर बनी फिल्मों की लंबी लिस्ट है लेकिन इस क्षेत्र में जो होता रहा है उस पर हिंदी की मुख्यधारा की फिल्म बनाकर अनुभव ने जोखिम भी बहुत बड़ा लिया है। फिल्म ‘अनेक’ विश्व सिनेमा का नया अनुभव है। जिस तरह की ये फिल्म बनी है और जो इसका असर जाग्रत दर्शकों पर होता है, उस लिहाज से इसे अगले ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भारत की तरफ से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में जाना ही चाहिए। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की ज्यूरी की अपनी काबिलियत पर भी इस फैसले की धुरी टिकी रहेगी।

मौजूदा समय की जरूरी फिल्म


फिल्म ‘अनेक’ उसी कंपनी टी सीरीज की फिल्म है जिसकी पिछली फिल्म ‘भूल भुलैया 2’ इन दिनों बॉक्स ऑफिस की फेवरेट फिल्म है। दोनों फिल्मों के प्रचार के धरातल का अंतर भी फिल्म की रिलीज के पहले बने माहौल से समझ आता है। 




आयुष्मान खुराना खुद भी कहते हैं कि ‘अनेक’ जैसी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस आंकड़े ज्यादा मायने नहीं रखते। मायने रखता है इस बात का लोगों तक पहुंचना। लेकिन मेरा मानना है कि ‘अनेक’ जैसी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर चलना बहुत जरूरी है। ये ‘द नॉर्थ ईस्ट फाइल्स’ है। इस फिल्म के लिए किसी राजनीतिक दल या उससे जुड़े संगठन ग्रुप बुकिंग नहीं करेंगे लेकिन नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए ये एक जरूरी फिल्म है। इस देश को जानने के लिए। इस देश का दर्द पहचानने के लिए।

आइडो और जोशुआ की प्रेम कहानी


उत्तर पूर्व के इस दर्द को परदे पर बहुत ही सादगी और सच्चे मन से पेश करती है फिल्म ‘अनेक’। आइडो और जोशुआ के अनकहे प्रेम की कहानी इस सच का छलावा है। ये वैसा ही छलावा है जैसा उत्तर पूर्व के राज्यों के साथ लगातार होता रहा है। 

दिल्ली की बनिस्बत चीन और म्यांमार के ज्यादा करीब इन राज्यों के लोग खुद को ‘भारतीय’ क्यों और कैसे कहें, इस पर सवाल उठाते आयुष्मान खुराना के चेहरे की झुंझलाहट ही वहां के सामान्य नागरिक का दर्द है। एंड्रिया को भारत की तरफ से खेलना है लेकिन लोग उसे भारतीय मानें तब ना। फिल्म के क्लाइमेक्स में आइडो और अमन का संघर्ष समानांतर घटता है। और, यहीं आकर फिल्म उस दायरे से बाहर निकल जाती है जिसे बॉक्स ऑफिस की कसौटी कहा जाता है।


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